चलती चक्की देख के ~ संत कबीर दास जी के दोहे

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये ।rnदो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए ॥rnrnभावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं, जब उन्होंने चलती हुई चक्की (गेहूं पीसने या दाल पीसने में इस्तेमाल किया जाने वाला यंत्र) को देखा तो वह रोने लगे क्योंकि वह देखते हैं की किस प्रकार दो पत्थरों के पहियों के निरंतर आपसी घर्षण के बीच कोई भी गेहूं का दाना या दाल साबूत नहीं रह जाती, वह टूटकर या पिस कर आंटे में परिवर्तित हो रहे हैं। कबीर दास जी अपने इस दोहे से कहना चाहते है कि जीवन के इस संघर्ष में लोग किस प्रकार अपने जीवन का असली उद्देश्य…rnपूरा पढ़े -> https://bit.ly/2Py8NwKBacklinks Image For Post

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।

चलती चक्की देख के ~ संत कबीर दास जी के दोहे https://kabir-k-dohe.blogspot.com/2021/03/chalti-chakki-dekh-ke.html

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